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विदेश जाने वाले 90% स्टूडेंट्स भारत में मेडिकल की प्रवेश परीक्षा NEET में होते हैं फेल: केंद्रीय मंत्री

नई दिल्ली: भारत के हजारों विद्यार्थी हर वर्ष मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेशों का रुख करते हैं। इसका एक मुख्य कारण तो यह है कि कुछ देशों में एमबीबीएस की डिग्री भारत के मुकाबले कम खर्चे पर हासिल की जा सकती है। हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि विदेश के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाना भी भारत के मुकाबले आसान है जहां सीमित सीटों के लिए काफी ज्यादा प्रतिस्पर्धा होती है। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि विदेश जाने वाले 90% मेडिकल स्टूडेंट्स वो होते हैं जो नीट क्लियर नहीं कर पाते हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस पर बहस करने का सही वक्त अभी नहीं है।

विदेश जाने वाले 60% भारतीय पहुंचते हैं ये तीन देश
मेडिकल की पढ़ाई के लिए बाहर जाने वाले 60% भारतीय स्टूडेंट्स चीन, रूस और यूक्रेन पहुंचते हैं। इनमें भी अक्सर करीब 20% अकेले चीन जाते हैं। इन देशों में एमबीबीएस के पूरे कोर्स की फीस करीब 35 लाख रुपये पड़ती है जिसमें छह साल की पढ़ाई, वहां रहने, कोचिंग करने और भारत लौटने पर स्क्रीनिंग टेस्ट क्लियर करने का खर्च, सबकुछ शामिल होता है। इसकी तुलना में भारत के प्राइवेट कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स की केवल ट्यूशन फीस ही 45 से 55 लाख रुपये या इससे भी ज्यादा पड़ जाती है।

हर वर्ष करीब 25 हजार मेडिकल स्टूडेंट्स जाते हैं विदेश

अनुमान है कि 20 से 25 हजार मेडिकल स्टूडेंट्स हर वर्ष विदेश जाते हैं। भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए NEET एंट्रेंस एग्जाम पास करना होता है। यहां हर वर्ष सात से आठ लाख स्टूडेंट्स NEET क्वॉलिफाइ करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि देशभर में मेडिकल की सिर्फ 90 हजार से कुछ ही ज्यादा सीटें हैं। इनमें आधे से कुछ ज्यादा सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं जहां से पढ़ाई सस्ती है लेकिन वहां एडमिशन तभी मिल सकता है जब नीट में बेहतरीन स्कोर मिले। प्राइवेट कॉलेजों की सरकारी कोटा वाली सीटों में एडमिशन के लिए भी नीट में हाई स्कोर हासिल करना होता है। अगर स्कोर कम है तो प्राइवेट कॉलेजों में सरकारी कोटा सीटों पर एडमिशन नहीं हो पाता है और मैनेजमेंट कोटे से एडमिशन की फीस बहुत ज्यादा हो जाती है।

भारत में मैनेजमेंट कोटे से मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी
देशभर के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में मैनेजमेंट कोटा की सीटें भी करीब 20 हजार के आसपास ही हैं। इनमें भी सैद्धांतिक तौर पर अप्रवासी भारतीयों के लिए एनआरआई कोटा सीटें होती हैं, लेकिन उनकी फीस भी काफी ज्यादा होती है। मैनेजमेंट और एनआरआई कोटा की फीस ही करीब 30 लाख रुपये से लेकर 1.20 करोड़ रुपये तक हो जाती है जिसमें 4 से 5 वर्ष का कोर्स कवर होता है। साल दर साल इसका 14 से 20 प्रतिशत अन्य मदों में खर्च होता है। कोर्स पूरा करने के बाद किसी अस्पताल में एक वर्ष का इंटर्नशिप करना पड़ता है।


यूक्रेन में पढ़ाई से 6 साल में हो मिल जाती है MBBS की डिग्री

फॉरन मेडिकल ग्रैजुएट लाइसेंसिएट रेग्युलेशंस के नए नियमों के मुताबिक, कोई स्टूडेंट एमबीबीएस का कोर्स 10 वर्षों में पूरा कर सकता है। एमबीबीएस के लिए कम-से-कम 4.5 वर्ष का कोर्स वर्क होता है और दो वर्ष का इंटर्न- एक वर्ष उस देश में जहां से कोर्स पूरा किया और एक वर्ष भारत में। यूक्रेन में एमबीबीएस की डिग्री छह वर्षों में मिल जाती है।

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